नमस्कार and welcome to Purushxarth!

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पुरुषार्थ क्या है?

सनातन धर्म में पुरुषार्थ का अर्थ है – जीवन के प्रमुख लक्ष्य, जो मानव जीवन को सही दिशा देने के लिए बताए गए हैं।

चार प्रकार के पुरुषार्थ

  1. धर्म (नैतिकता और कर्तव्य) – सही और गलत का ज्ञान, नैतिक आचरण, समाज और परिवार के प्रति जिम्मेदारी।
  2. अर्थ (धन और समृद्धि) – आजीविका कमाना, धन का सदुपयोग, अपने और दूसरों का भरण-पोषण करना।
  3. काम (इच्छाएँ और सुख) – शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतोष, इच्छाओं की पूर्ति करना, लेकिन संयम के साथ।
  4. मोक्ष (आत्म-साक्षात्कार और मुक्ति) – जीवन-मरण के चक्र से मुक्त होकर आत्मा का परमात्मा से मिलन।

पुरुषार्थ का महत्व

  • धर्म के बिना अर्थ और काम अधूरे रह जाते हैं।
  • अर्थ और काम के बिना जीवन में स्थिरता नहीं आती।
  • मोक्ष के बिना जीवन का अंतिम उद्देश्य अधूरा रहता है।
  • इन चारों का सही संतुलन जीवन को सफल और पूर्ण बनाता है। लेकिन इन चारों के अलावा और एक पुरुषार्थ भी है, भागवत पुराण में इसको मोक्ष से भी ऊँचा स्थान दिया गया है क्योंकि यह भगवान से मिलन का सर्वोत्तम मार्ग है।

पाँचवाँ पुरुषार्थ: प्रेम (प्रेम)

  • प्रेम को पंचम पुरुषार्थ कहा गया है, विशेषकर गौड़ीय वैष्णव परंपरा में।
  • मोक्ष केवल मुक्ति है, लेकिन प्रेम भगवान के प्रति शाश्वत प्रेममयी भक्ति प्रदान करता है।
  • श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा कि “कृष्ण-प्रेम ही परम लक्ष्य है।”